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Updesh Quotes | अच्छे उपदेश जो जीवन बदल दे

Updesh Quotes | अच्छे उपदेश जो जीवन बदल दे आपको अच्छा उपदेश कौन देता माता पिता टीचर और भाई बहन सभी उपदेश देते है आपको हमारा उपदेश भी पसंद आयेगा

जो मनुष्य बैठा रहता है, उसका सौभाग्य (भग) भी रुका रहता है । जो उठ खड़ा होता है उसका सौभाग्य भी उसी प्रकार उठता है । जो पड़ा या लेटा रहता है उसका सौभाग्य भी सो जाता है । और जो विचरण में लगता है उसका सौभाग्य भी चलने लगता है । इसलिए तुम विचरण ही करते रहो ।

दैव यानी भाग्य का विचार करके व्यक्ति को कार्य-संपादन का अपना प्रयास त्याग नहीं देना चाहिए । भला समुचित प्रयास के बिना कौन तिलों से तेल प्राप्त कर सकता है ?

कठोर वचन रूपी बाण दुर्जन लोगों के मुख से निकलते ही हैं, और उनसे आहत होकर अन्य जन रातदिन शोक एवं चिंता के घिर जाते हैं । स्मरण रहे कि ये वाग्वाण दूसरे के अमर्म यानी संवेदनाशून्य अंग पर नहीं गिरते, अतः समझदार व्यक्ति ऐसे वचन दूसरों के प्रति न बोले ।

दूसरे के मर्म को चोट न पहुंचाए, चुभने वाली बातें न बोले, घटिया तरीके से दूसरे को वश में न करे, दूसरे को उद्विग्न करने एवं ताप पहुंचाने वाली, पापी जनों के आचरण वाली बोली न बोले ।

अनजाने में जिन्होंने अपराध किया हो उनका अपराध क्षमा किया जाना चाहिए, क्योंकि हर मौके या स्थान पर समझदारी मनुष्य का साथ दे जाए ऐसा हो नहीं पाता है । भूल हो जाना असामान्य नहीं, अतः भूलवश हो गये अनुचित कार्य को क्षम्य माना जाना चाहिए ।

व्यक्ति के कर्म ऐसे हों कि सज्जन लोग उसके समक्ष सम्मान व्यक्त करें ही, परोक्ष में भी उनकी धारणाएं सुरक्षित रहें । दुष्ट प्रकृति के लोगों की ऊलजलूल बातें सह ले, और सदैव श्रेष्ठ लोगों के सदाचारण में स्वयं संलग्न रहे ।

दातौन एवं कफ थूकने के पश्चात् उसे ढक देना चाहिए । इतना ही नहीं पानी, सार्वजनिक भूमि एवं आवासीय स्थल पर मूत्र आदि का त्याग निंदनीय कर्म है, अतः ऐसा नहीं करना चाहिए ।

मुंह में ठूंसकर, चप-चप जैसी आवाज के साथ एवं मुख पूरा फैलाकर भोजन नहीं करना चाहिए । पैर फैलाकर बैठने से भी बचे और दोनों बांहों को साथ-साथ न मरोड़े ।

रास्ते के बारे में पूछने वाले पथिक को उंगली के इशारे से संकेत नहीं देना चाहिए, बल्कि समूचे दाहिने हाथ को धीरे-से समुचित दिशा की ओर उठाते हुए आदर के साथ रास्ता दिखाना चाहिए ।

अब यदि बुद्धि प्रयोग से यानी सोच-समझकर अपराध करने के बाद वे तुमसे कहें कि अनजाने में ऐसा हो गया है, तो ऐसे मृथ्याचारियों को थोड़े-से अपराध के लिए भी दण्डित किया जाना चाहिए ।

jo manushya baitha rahata hai, usaka saubhagya (bhag) bhi ruka rahata hai . jo uth khada hota hai usaka saubhagya bhi usi prakar uthata hai . jo pada ya leta rahata hai usaka saubhagya bhi so jata hai . aur jo vicharan men lagata hai usaka saubhagya bhi chalane lagata hai . isalie tum vicharan hi karate raho .

daiv yani bhagya ka vichar karake vyakti ko kary-snpadan ka apana prayas tyag nahin dena chahie . bhala samuchit prayas ke bina kaun tilon se tel prapta kar sakata hai ?

kathor vachan rupi ban durjan logon ke mukh se nikalate hi hain, aur unase ahat hokar anya jan ratadin shok evn chinta ke ghir jate hain . smaran rahe ki ye wagwan dusare ke amarm yani snvedanashunya ang par nahin girate, atah samajhadar vyakti aise vachan dusaron ke prati na bole .

dusare ke marm ko chot na pahunchae, chubhane wali baten na bole, ghatiya tarike se dusare ko vash men na kare, dusare ko udwign karane evn tap pahunchane wali, papi janon ke acharan wali boli na bole .

anajane men jinhonne aparadh kiya ho unaka aparadh kshama kiya jana chahie, kyonki har mauke ya sthan par samajhadari manushya ka sath de jae aisa ho nahin pata hai . bhul ho jana asamanya nahin, atah bhulavash ho gaye anuchit karya ko kshamya mana jana chahie .

vyakti ke karm aise hon ki sajjan log usake samaksh samman vyakt karen hi, paroksh men bhi unaki dharanaen surakshit rahen . dusht prakriti ke logon ki ulajalul baten sah le, aur sadaiv shreshth logon ke sadacharan men swayn snlagn rahe .

dataun evn kaf thukane ke pashchat. ha use dhak dena chahie . itana hi nahin pani, sarvajanik bhumi evn awasiya sthal par mutra adi ka tyag nindaniya karm hai, atah aisa nahin karana chahie .

munh men thunsakar, chap-chap jaisi awaj ke sath evn mukh pura failakar bhojan nahin karana chahie . pair failakar baithane se bhi bache aur donon banhon ko sath-sath na marode .

raste ke bare men puchhane wale pathik ko ungali ke ishare se snket nahin dena chahie, balki samuche dahine hath ko dhire-se samuchit disha ki or uthate hue adar ke sath rasta dikhana chahie .

ab yadi buddhi prayog se yani soch-samajhakar aparadh karane ke bad ve tumase kahen ki anajane men aisa ho gaya hai, to aise mrithyachariyon ko thode-se aparadh ke lie bhi dandit kiya jana chahie .

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